दिल

मेरे दिल की जगह कोई खिलौना रख दिया जाए ,
वो दिल से खेलते रहते हैं , दर्द होता है "

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

The Lonely Lady

असी ईशक कमाई कारदे  रहे 
असी पाई पाई मारदे  रहे 
ओना गम देन दी आदत सी 
असी गम कलावे पारदे रहे 
असी जख्म आपने तेजाब नलाए 
ओ मलहम लगोन ते डारदे रहे
कदे ओ भी दिन सी मेरे सज्जना 
सानु नाल वेख लोकी साड़दे रहे 
स्कूल , पढाईयाँ छाड़ के यारा 
असी  ईशक  पढाईयाँ पाढ़दे रहे 
असी गन्ने दे  रास माँगू 
 ईशक दी भठ्ठी उते काढ़दे रहे   


असी ईशक कमाई कारदे  रहे 
असी पाई पाई मारदे  रहे.…
                                                                                                      -शिव कुमार साहिल- 

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

दोस्ती

जब दोस्तों ने दोस्ती निभाई 
बड़ी मुश्किल से जान बचाई 


दो दिन बस साथ निभा कर 
ताना कसे के उम्र गवाई 


जब तुम बिलकुल सच्चे हो 
क्यों देते हो अपनी सफाई 


जेब तुम्हारी खाली 'साहिल' 
कौन करेगा तेरी सुनाई 




शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

मेरा दिल


वो मुझे छोड़ के अगर जाएगा 

मेरा दिल टूट के बिखर जाएगा 


चुबेगा पांव में टूटे कांच की तरह 

वो जिस तरफ,  जिधर जाएगा  


वेसे लग चुकी हैं ठोकर दिल को 

फिर भी लगता नही, सुधर जाएगा


पूछता हैं समंदर से 'साहिल' ,

तू  मुझे छोड़ के किधर जाएगा ?





















© शिव कुमार साहिल ©

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

"हम ना समझ पाए निगाहों के माइने उनके !
सब समझते थे जबके बेजुबान आईने उनके !!"
















                        (ग़ज़ल)


आँख को आब समझता कब हैं
आके आँखों में ठहरता कब हैं


जिरह करता हैं वो हर वक्त मुझसे
और कहता हैं के झगड़ता कब हैं


रोज जलती हैं तन्हाई दिल में
दिल में धुँआ हैं निकलता कब हैं 


रोज मनाता हूँ के भूल जा उसको
नादान  दिल पर समझता कब हैं



©  शिव कुमार "साहिल" ©

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

आईना



















चेहरा उतर ना पाया आईने में
आईना इल्तजा करता रहा
कुछ देर निहार कर खुद को
चेहरा ना जाने कहाँ गया

आईना तन्हा है सदियों से 
जिसका अपना चेहरा तक नही 

ठीक अपने रिश्ते की तरह !! 




© शिव कुमार साहिल ©

सोमवार, 5 नवंबर 2012

कवि और कविता



जिनके लिए लिखता है कवि , कविता
कविता पहुँच नही पाती उन तक


दावा करता है कवि
बदल देगा कविताओं से
भ्रष्ट व्यवस्थायों को
मिटा देगा असमानतायों को
पर कुछ भी तो नही
बदल पाया , मिटा पाया अब तक

जिनके लिए लिखता है कवि , कविता
कविता पहुँच नही पाती उन तक


कवितायें कवियों तक सीमित
साहित्य रूचि तक
बाज़ारबादी युग में
हर रूचि की है इक निश्चित कीमत

महँगाई के दौर में
मुफ्त में मिलता नही है कुछ भी
एक कविता भी नही
फिर केसे खरीदे
आम आदमी इक कविता

जिनके लिए लिखता है कवि , कविता
कविता पहुँच नही पाती उन तक 

                       









© शिव कुमार  साहिल ©

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

इक तस्वीर

मेरे गमखाने में
बस इक तस्वीर है उसकी
जो बनाई है
मेरे लहू से उसने

फिर भी लगता है उसको  
के वो इतनी
रंगीन  नही है अभी


इसलिए तो
वो बनाती है रोज
नया इक जख्म दिल पर
और भरती है अपनी तस्वीर में
मेरे दिल का ताज़ा लहू
फिर भी  लगता है उसको
के वो इतनी
रंगीन  नही है अभी


मेरे गमखाने में
बस इक तस्वीर है उसकी
जो बनाई है
मेरे लहू से उसने



© शिव कुमार साहिल ©

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

सजा दो मुझको




















नसीहत , बददुआ  या सजा दो मुझको 

रिश्ता ना मिटाओ मिटा दो  मुझको   

बहे आँखों से क्यों तब अक्श-ए -लहू ?
कह जाए वो जब भुला दो  मुझको   ?

आते-जाते रहो दर्द बढ़ाने के लिए 
कौन कहता हैं के दबा दो मुझको  

हूँ मुसाफिर इक रोज तो चला जाऊंगा 
दो इक रोज लिए ही पनाह दो मुझको 

ऐ समंदर तू अब के 'साहिल' से भी मिल 
तब तुम्हे मानुगा जो डूबा दो मुझको 



© शिव कुमार साहिल ©