दिल
मेरे दिल की जगह कोई खिलौना रख दिया जाए ,
वो दिल से खेलते रहते हैं , दर्द होता है "
सोमवार, 26 मई 2014
शनिवार, 28 दिसंबर 2013
The Lonely Lady
असी ईशक कमाई कारदे रहे
असी पाई पाई मारदे रहे
ओना गम देन दी आदत सी
असी गम कलावे पारदे रहे
असी जख्म आपने तेजाब नलाए
ओ मलहम लगोन ते डारदे रहे
कदे ओ भी दिन सी मेरे सज्जना
सानु नाल वेख लोकी साड़दे रहे
स्कूल , पढाईयाँ छाड़ के यारा
असी ईशक पढाईयाँ पाढ़दे रहे
असी गन्ने दे रास माँगू
ईशक दी भठ्ठी उते काढ़दे रहे
असी ईशक कमाई कारदे रहे
असी पाई पाई मारदे रहे.…
-शिव कुमार साहिल-
असी पाई पाई मारदे रहे
ओना गम देन दी आदत सी
असी गम कलावे पारदे रहे
असी जख्म आपने तेजाब नलाए
ओ मलहम लगोन ते डारदे रहे
कदे ओ भी दिन सी मेरे सज्जना
सानु नाल वेख लोकी साड़दे रहे
स्कूल , पढाईयाँ छाड़ के यारा
असी ईशक पढाईयाँ पाढ़दे रहे
असी गन्ने दे रास माँगू
ईशक दी भठ्ठी उते काढ़दे रहे
असी ईशक कमाई कारदे रहे
असी पाई पाई मारदे रहे.…
बुधवार, 18 दिसंबर 2013
शुक्रवार, 15 मार्च 2013
शनिवार, 23 फ़रवरी 2013
शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013
"हम ना समझ पाए निगाहों के माइने उनके !
सब समझते थे जबके बेजुबान आईने उनके !!"

(ग़ज़ल)
आँख को आब समझता कब हैं
आके आँखों में ठहरता कब हैं
जिरह करता हैं वो हर वक्त मुझसे
और कहता हैं के झगड़ता कब हैं
रोज जलती हैं तन्हाई दिल में
दिल में धुँआ हैं निकलता कब हैं
रोज मनाता हूँ के भूल जा उसको
नादान दिल पर समझता कब हैं
सब समझते थे जबके बेजुबान आईने उनके !!"

(ग़ज़ल)
आँख को आब समझता कब हैं
आके आँखों में ठहरता कब हैं
जिरह करता हैं वो हर वक्त मुझसे
और कहता हैं के झगड़ता कब हैं
रोज जलती हैं तन्हाई दिल में
दिल में धुँआ हैं निकलता कब हैं
रोज मनाता हूँ के भूल जा उसको
नादान दिल पर समझता कब हैं
© शिव कुमार "साहिल" ©
शुक्रवार, 16 नवंबर 2012
सोमवार, 5 नवंबर 2012
कवि और कविता
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जिनके लिए लिखता है कवि , कविता
कविता पहुँच नही पाती उन तक
दावा करता है कवि
बदल देगा कविताओं से
भ्रष्ट व्यवस्थायों को
मिटा देगा असमानतायों को
पर कुछ भी तो नही
बदल पाया , मिटा पाया अब तक
जिनके लिए लिखता है कवि , कविता
कविता पहुँच नही पाती उन तक
कवितायें कवियों तक सीमित
साहित्य रूचि तक
बाज़ारबादी युग में
हर रूचि की है इक निश्चित कीमत
महँगाई के दौर में
मुफ्त में मिलता नही है कुछ भी
एक कविता भी नही
फिर केसे खरीदे
आम आदमी इक कविता
जिनके लिए लिखता है कवि , कविता
कविता पहुँच नही पाती उन तक
© शिव कुमार साहिल ©
शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012
इक तस्वीर
मेरे गमखाने में
बस इक तस्वीर है उसकी
जो बनाई है
मेरे लहू से उसने
फिर भी लगता है उसको
के वो इतनी
रंगीन नही है अभी
इसलिए तो
वो बनाती है रोज
नया इक जख्म दिल पर
और भरती है अपनी तस्वीर में
मेरे दिल का ताज़ा लहू
फिर भी लगता है उसको
के वो इतनी
रंगीन नही है अभी
मेरे गमखाने में
बस इक तस्वीर है उसकी
जो बनाई है
मेरे लहू से उसने

© शिव कुमार साहिल ©
बस इक तस्वीर है उसकी
जो बनाई है
मेरे लहू से उसने
फिर भी लगता है उसको
के वो इतनी
रंगीन नही है अभी
इसलिए तो
वो बनाती है रोज
नया इक जख्म दिल पर
और भरती है अपनी तस्वीर में
मेरे दिल का ताज़ा लहू
फिर भी लगता है उसको
के वो इतनी
रंगीन नही है अभी
मेरे गमखाने में
बस इक तस्वीर है उसकी
जो बनाई है
मेरे लहू से उसने

© शिव कुमार साहिल ©
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