दिल

मेरे दिल की जगह कोई खिलौना रख दिया जाए ,
वो दिल से खेलते रहते हैं , दर्द होता है "

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

इक सुलगती याद



इस दफा ...

पिघल ही जायेंगी

जमी सदियों पुरानी बर्फीली बादियाँ

इक सुलगती याद जो गुजरी हैं

हवाओं के होठों पर बड़बड़ाते हुए !



नजर से दूर ,

कहीं , बहुत दूर

गुज़रे वक्त को गले से लगा

कोई जिरह कर रहा हैं , शायद

मौजूदा वक्त से …….



ये यादों के कारवां

ये तन्हाइयों के साये

बेरोक डराते हैं मुझे

जो सामने हैं , पर दिखाई भी नही देते

बहुत कुछ कहते हैं मुझसे

पर सुनाई भी नही देते

और कुछ सुनते भी नही हैं


पर लगता हैं के यहीं हैं

मेरे आस-पास ही कहीं हैं

तुम होते तो इन सब का कोई वजूद ना होता

इन सब से मुझे कोई खौफ ना होता !!

देखना..

इस दफा ...

पिघल ही जायेंगी

जमी सदियों पुरानी बर्फीली बादियाँ

इक सुलगती याद जो गुजरी हैं

हवाओं के होठों पर बड़बड़ाते हुए !!




© शिव कुमार 'साहिल' ©

बुधवार, 28 सितंबर 2011

ग़ज़ल ( आज गम इतना बढ़ाना )







आज गम इतना बढ़ाना के जमाना याद रखे
शराब इतनी पिलाना के मयखाना याद रखे

बंद कर दो दरवाज़े हवा भी गुजर ना पाए
तन्हा इतना कर जाना के तयखाना याद रखे

खून पीकर ही प्यास बुझे तो हाज़िर हूं हजूर
खून इतना बहाना के पैमाना याद रखे

कब से दिल सुलग रहा मुझको भी आग लगा
और फिर इतना जलाना के परवाना याद रखे

मेरी दीवानगी को क्या तोहफा हैं मिला
कब्र को इतना सजाना हर दीवाना याद रखे

© शिव कुमार साहिल ©





आप जी से विनम्र निवेदन हैं के उपरोक्त ग़ज़ल को अपना आशीर्बाद दे , क्योंकि ग़ज़ल कि बारीकियों , तकनिकी पक्ष से तो मैं अभी नवाकिफ ही हूं , इसलिए आप फ़नकारो से आग्रह हे के उपरोक्त ग़ज़ल को ग़ज़ल बना दीजे और मेरा मार्गदर्शन कीजिए ! धन्यबाद !

शनिवार, 24 सितंबर 2011

तेरा ख्याल





वो देख केसे इक नज्म
चली आ रही हैं ,
कुछ आवारा से लफ्जों को हांकते हुए ,
मेरे जहन की तरफ


देख, केसे वो बिखरे-बिखरे से
जाहिल से अल्फाज़
कितनी तहज़ीब कितनी तरतीब से
छोटे - छोटे कदमो की
मध्यम - मध्यम आवाज के साथ
चुपचाप चरते विचरते
नज्म के इशारों पर
चले आ रहे हैं


वो देख कुछ शव्दों के बदन पर
तेरी खुशबू की गीली मिटटी
अब भी चिपकी हुई हैं
वो देख कुछ नन्हे से लफ्जों ने
अपनी पीठ पर तेरे खावों को
अब भी उठाये रखा हैं
और यरा इनकी निगाहों में
इक दफा झांक कर तो देख
तेरे चहरे को भूल ही नही पाई हैं
ये गमगीन सी आँखे


तेरी मोजुदगी में , तेरी रंगीनियों में
तेरी यादों , तेरी बातों के
झरने के नीचे नहा कर
कितनी निखर आई हैं ये नज्म
देख केसे ये अलफ़ाज़ जी उठे हैं
देख केसे इक नज्म को

जिंदगी वख्श के जा रहे हैं

तेरे ख्याल भर ही ...

कभी आओ मेरे भी घर
यरा सा छु ही जाओ मुझे !!





© शिव कुमार साहिल ©

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

गीला मोसम !!

बादल ने छींका और
सावन
की पहली फुआर
इक
साथ कई धुंधलाई ,
पुरानी
यादों को
ताजा
कर गई
रास्तों
में पड़े हुए गढों के साथ-साथ
खुरदरी आँखों को भी भर गई ,
डूबा
गई नमकीन से पानी में
वो
सावन की पहली फुआर !

दिलासा
देता था हर शाम
वो
मेरी तन्हाई का साथी
मीलों
पैदल चलके ,
जाने
कहाँ से
दफअतन , बैठ जाता था
मेरी
खिड़की पर आकर
कई
दिनों से
दिखा
नही हैं वो चाँद
शायद
.........
फिसल
के गिर गया होगा कही
इस गिले मोसम में !

ये मोसम जाने दे
तो
उसे ढूंढ़ कर
टकोर
ही कर आंऊ
पांव
में मोच आ गई होगी उसके

पर
उफ़ .......
ये
गीला मोसम
!!






(C) शिव कुमार साहिल (C)




गुरुवार, 4 अगस्त 2011

बीमार मोसम

इक अरसे से मोसम
तेज बुखार से पीड़ित हैं
सारा बदन तपतपा रहा हैं उसका
और उसके सेक की वजह से
ग्लेशिअर तक पिघल रहे हैं , खिसक रहे हैं

ये बुखार का ताप और उपर से
जेठ महीने की गर्म हवाएं
ये कारखानों , मोटर वाहनों का
नाजायज गर्म धुँआ
ये मानव बम ये ...ये परमाणु बमों की
आग उगलती मोजुदगी

कई - कई विधवा ओरतों ,
अनगिनत अनाथ बच्चों के
वाष्पीकृत होते हुए गर्म अक्श

ये गर्मी , ये बेरहम गर्मी
ठंडा पानी इक पल में ही उबाल मारने लगता हैं
बर्फ के टुकड़े इक क्षण में ही पिघले जा रहे हैं

ऐसे में भला केसे रखूं
मोसम के माथे पर
ठंडे- ठंडे पानी की
ठंडी-ठंडी पटियां ?


(c) शिव कुमार साहिल (c)

बुधवार, 1 जून 2011

तेरे जाने के बाद !!

इक ऐसी नज्म हैं जो सीने में अटकी हैं कहीं
इक ऐसी ग़ज़ल हैं जिसे कभी कहूँगा नही
इक ऐसा लफ्ज़ हैं जो तुझ तक पहुंचा ही नही
मेरा तो सब अधुरा सा तुने छोड़ दिया

सारा कसूर दिल का हैं दिल ही मुकरे अब
छाया तलिस्म तुम्हारा हैं केसे निकले अब
कोई तो खोल दे रस्ता जो ले जाए तेरी जानिब
या तुम ही निकलो घर से कभी मेरी मानिद

नहीं तो नज्म निकल कर सवाल पूछेगी तुम्हे
नहीं तो गजल भी ताने कसेगी तुम्हे
तो आवारा इक लफ्ज़ परेशाँ करेगा तुम्हे

तुम आ जाओ या मोत आ जाए अब
सारा कसूर गर दिल का हैं मैं क्यों भुगतू सब !!




@ शिव कुमार साहिल @

सोमवार, 14 जून 2010

फिर भी चला हूँ उसी की जानिब !!


उसने कहा था कही मिलेंगे फिर से

यूँ पीछे मुड कर , उसने देखा भी नही

ऎसा हुआ था , पर ऎसा लगता ही नहीं !


फिर भी चला हूँ उसी की जानिब

उसको लगता है उस तरफ की हवा है बस !!


©शिव कुमार साहिल ©

रविवार, 25 अप्रैल 2010

शिकायतकर्ता !!

आज का दिन भी
बिना कुछ काम किए गवा दिया आपने ,
गर मेहनत की होती
तो पसीने की कोई बूंद गिरी ही होती
कितनी ज़िम्मेदारी का काम
सपुर्द किया गया है आपको
और आप हो के लापरवाह होते जा रहे हो ,
दिन- प्रतिदिन
अपना धुंधला सा चश्मा उतार कर फेंक दो
या फिर इस पर लगी धूल पोंछ कर देखो ,
देखो , जमीन के होंठ केसे फटें पड़ें है
पानी की कमी से
पानी तो जीवन है
और
उसकी प्यास से मोत तक हो जाती है
मगर आप कभी प्यासे रहे नहीं होगे
बचपन से देख रहा हूँ
आप
एक ही नौकरी में लगे हो
और वो भी पानी डोने की
फिर प्यास का तो सवाल ही नही
जन कल्याण के लिए
पानी का विभाग है आपके पास
और आप हो के बूंद - बूंद को तरसाते हो
शुरू - शुरू में तो बड़े पावंद थे ,
बड़े ईमानदार थे , बड़ा जोश था
अपने काम के प्रति
और अब ....
इतनी
लापरवाही , इतना आलस्यपन
कई- कई दिनों तक गेर- हाज़िर रहते हो
अपनी मर्ज़ी से आते हो ,
और
फिर उभाईयाँ लेते हुए
सुस्ताते रहते हो दिन भर
पर अब बहुत हुआ
आपकी
शिकायत करनी पड़ेगी
आला अधिकारीयों से !

जी, जरुर कीजिए
मैं भी तंग आ गया हूँ
अब इस विभाग से
पहले- पहल तो सब ठीक था
सब आसान था
पर अब यह असंतुलन तो देखिये
मेरी विवशता तो देखिये
कई - कई दिनों तक
भटकता रहता हूँ मैं दर ब दर,
ये नदियाँ , तालाब , ये झरने तक
प्यासे बेठे है ,
कहीं उधार में भी , पानी मिल नही रहा है
मेरा तो पसीना तक सोंख लेती है
यह प्यासी हवायें
पानी की कमी से
इक नई किस्म की बीमारी हो गई है मुझे
हमारे यहाँ तो मुद्रा का चलन भी नहीं हैं
वरना कम से कम अपने लिए तो
एक-आध पानी की बोतल खरीद ही लेता
आपके बाजार से

मुफ्त बांटता था मैं पानी
और आप लोगो ने कारोबार चला रखा हैं
बूंद -बूंद तक बेचते हो आप लोग

आप लोगो की वजह से ,
बीमार पड़ा हैं पूरा प्राक्रतिक चक्र
कारण आप हो महोदय मेरी इस अवस्था के
मेरी इस रुग्नता के !

मैं तो खुद अस्तिफा देने जा रहा हूँ
अपनी
इस नौकरी से
आप सिर्फ शिकायत कर सकते हो
तो फिर कीजिए शिकायत !!

"इतना कहकर बादल चलता हुआ
शिकायतकर्ता देर तक सोचता रहा

हैं कौन गुनेहगार ? मैं के वो
माथा पकड के खुद से पूछता रहा


शिकायतकर्ता देर तक सोचता रहा !!

©
शिव कुमार साहिल ©