
इस दफा ...
पिघल ही जायेंगी
जमी सदियों पुरानी बर्फीली बादियाँ
इक सुलगती याद जो गुजरी हैं
हवाओं के होठों पर बड़बड़ाते हुए !
नजर से दूर ,
कहीं , बहुत दूर
गुज़रे वक्त को गले से लगा
कोई जिरह कर रहा हैं , शायद
मौजूदा वक्त से …….
ये यादों के कारवां
ये तन्हाइयों के साये
बेरोक डराते हैं मुझे
जो सामने हैं , पर दिखाई भी नही देते
बहुत कुछ कहते हैं मुझसे
पर सुनाई भी नही देते
और कुछ सुनते भी नही हैं
पर लगता हैं के यहीं हैं
मेरे आस-पास ही कहीं हैं
तुम होते तो इन सब का कोई वजूद ना होता
इन सब से मुझे कोई खौफ ना होता !!देखना..
इस दफा ...
पिघल ही
जमी सदियों पुरानी बर्फीली बादियाँ
इक सुलगती याद जो गुजरी हैं
हवाओं के होठों पर बड़बड़ाते हुए !!
© शिव कुमार 'साहिल' ©





