दिल

मेरे दिल की जगह कोई खिलौना रख दिया जाए ,
वो दिल से खेलते रहते हैं , दर्द होता है "

रविवार, 16 अगस्त 2009

मेरा डर


डरता नही हूँ , के वो आएगी
डर हैं , के वो केसे आएगी
वो बस से , रेलगाडी से
या फ़िर पैदल आएगी
शहर दर् शहर भटककर
मीलों चल कर आएगी
ना जाने कयों ,
इक डर सा सताता हैं
इतनी भीड़ में कोई हादसा न हो जाए
उस बस या रेलगाडी में
कोई बम न फट जाए
कितने घूम रहे हैं बा इज़त बरी होकर
कोई बलात्कारी न मिल जाए
उसके पहनावे से
किसी मजहव में , कबीले में
कोई ज़ंग न छिड जाए
लेकिन यह तय हैं के उसे आना हैं
रस्ते की हर मुश्किल से गुजर जाना हैं
उसके नाम से सब बाकिफ हैं
मगर पहचानते नहीं
वो सफ़र पर निकल चुकी हैं
यह बात पक्की हैं
सब तय हैं फिर भी
सहमी सी सोच हैं
वह कोई और नहीं
सब की परिचित मोत हैं
इसलिए डरता नही हूँ ,
के वो आएगी
डर हैं , के वो केसे आएगी ?

3 टिप्‍पणियां:

gaurav ने कहा…

yar kya mast wording hai....

बेनामी ने कहा…

bhot khub,,,

kamal ने कहा…

kya kamaal ka kyal hein Mot k liye