दिल

मेरे दिल की जगह कोई खिलौना रख दिया जाए ,
वो दिल से खेलते रहते हैं , दर्द होता है "

गुरुवार, 14 मई 2009

डर

गास फूस के मकानों को चिंगारी से भी डर होता हैं

इलाज करनें वालों को भी बीमारी से डर होता हैं

ईमान बेच बेच कर ना दोलतें कमाओ , रहिसजादो

लुट ले जाने का जिसका चारदिवारी में भी डर होता हैं

महफूज तो हैं नही जे ख्याल भी अपने

जहन की गलिओं में भी किसी पहरेदारी से डर होता हैं

परत दर परत तह को हटाना, मजार से

खून चलने का ऐसी लाचारी में भी डर होता हैं

!!!!!!!!!! साहिल !!!!!!!!


1 टिप्पणी:

sarwat m ने कहा…

प्रिय साहिल,
पूरे एक माह के बाद ब्लॉग पर आया हूँ. तुमने मेरे बारे में बहुत गलत धारणा बनाई होगी कि मैं असभ्य, अशिष्ट और जाने क्या क्या हूँ, लेकिन मैं थोड़ी परेशानियों में था. अपना ई - मेल आई डी भेज सको तो भेज देना. मुझे कुछ कहना है.

सर्वत जमाल