दिल

मेरे दिल की जगह कोई खिलौना रख दिया जाए ,
वो दिल से खेलते रहते हैं , दर्द होता है "

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

क्या रखा हैं !

मश्हूरे -आलम में क्या रखा हैं
असल लिवाजों कों सबने छुपा रखा हैं

दर्द साथ हैं मेरे साये की तरह
मगर उसने भी चेहरा छुपा रखा हैं

किस पर यकीं करूँ , जरूरत के वक़्त
ख़ुद के दिल ने भी पर्दा बना रखा हैं

वो आ जाए चाहे बुझाने के लिए ,
हमने चिराग - ऐ - चाहत जला रखा हैं

किसी कों केसे मानु, ख़ुद की तडफन का सबब
अपनी सोच ने ही जब हमे उलझा रखा हैं

कही पर ना मिला वो रहनुमा, वो हमसफ़र ,
अब हर राह से हमने, फांसला बना रखा हैं

मिट ही जाएँगी तेरे साथ ये यादें भी "साहिल"
तुने खाम खा उलझन कों बडा रखा हैं !

© शिव कुमार "साहिल" ©

2 टिप्‍पणियां:

gaurav ने कहा…

sach kahun i dnt knew tu itna acha likh sakta hai.. keep it up yar.....

amit ने कहा…

very nice ,,,,
m really touched,u hv defind internal conflicts very well ,,
God bless u,,