दिल

मेरे दिल की जगह कोई खिलौना रख दिया जाए ,
वो दिल से खेलते रहते हैं , दर्द होता है "

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

गीला मोसम !!

बादल ने छींका और
सावन
की पहली फुआर
इक
साथ कई धुंधलाई ,
पुरानी
यादों को
ताजा
कर गई
रास्तों
में पड़े हुए गढों के साथ-साथ
खुरदरी आँखों को भी भर गई ,
डूबा
गई नमकीन से पानी में
वो
सावन की पहली फुआर !

दिलासा
देता था हर शाम
वो
मेरी तन्हाई का साथी
मीलों
पैदल चलके ,
जाने
कहाँ से
दफअतन , बैठ जाता था
मेरी
खिड़की पर आकर
कई
दिनों से
दिखा
नही हैं वो चाँद
शायद
.........
फिसल
के गिर गया होगा कही
इस गिले मोसम में !

ये मोसम जाने दे
तो
उसे ढूंढ़ कर
टकोर
ही कर आंऊ
पांव
में मोच गई होगी उसके

पर
उफ़ .......
ये
गीला मोसम
!!






(C) शिव कुमार साहिल (C)




6 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत दुखदायी है यह गीला मौसम ...अच्छी प्रस्तुति

नीरज गोस्वामी ने कहा…

टकोर शब्द का बहुत खूबसूरत प्रयोग किया है आपने अपनी इस रचना में...बधाई स्वीकारें..

नीरज

daanish ने कहा…

saawan ki fuhaaron se jurhi
bhooli-bisri yaadon ko
aise naazuq alfaaz mei baandh,
kaavya roop dene ke liye
mubarakbaad...
achhee rachnaa hai .

Suman ने कहा…

nice

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ... गीला मौसम और चाँद की फिसलन .. गज़ब के एहसास समेटे अहिं इस रचना में ... लाजवाब ...

shama ने कहा…

Nihayat sundar rachana hai!