सावन की पहली फुआर
इक साथ कई धुंधलाई ,
पुरानी यादों को
ताजा कर गई
रास्तों में पड़े हुए गढों के साथ-साथ
खुरदरी आँखों को भी भर गई ,
डूबा गई नमकीन से पानी में
वो सावन की पहली फुआर !
दिलासा देता था हर शाम
वो मेरी तन्हाई का साथी
मीलों पैदल चलके ,
जाने कहाँ से
दफअतन , बैठ जाता था
मेरी खिड़की पर आकर
कई दिनों से
दिखा नही हैं वो चाँद
शायद .........
फिसल के गिर गया होगा कही
इस गिले मोसम में !
ये मोसम जाने दे
तो उसे ढूंढ़ कर
टकोर ही कर आंऊ
पांव में मोच आ गई होगी उसके
पर उफ़ .......
ये गीला मोसम !!

(C) शिव कुमार साहिल (C)